अब तो सुन लो रेल सरकार,गरीबो को भी है सम्मान की दरकार ।

भारत में पशुओं को अगर किसी गाडी में भर कर ले जाया जाए तो गाडी वाले को पशु क्रुरता अधिनियम के तहत जेल भेजने तक का प्रावधान है। पर उसी देष में अगर ट्रेन की जनरल बोगी में लोगो को तादात से ज्यादा भरा जाए तो कोई कानून नहीं है।इस हिसाब से देखा जाए तो देष में गरीब की हालत जानवर से भी बद्वतर कही जा सकती है।
इस बात को पढ कर कई लोगों को लग रहा होगा कि में गरीबों की तोहीन कर रहा हूं,उनकी बेइज्जती कर रहा हूं, पर क्या हर रोज रेलवे विभाग गरीबों का अपमान नहीं करता।गरीबों को जानवरों की तरह जनरल बोगी में ठूंसने के लिए मजबूर नहीं करता।किसी भी ट्रेन के जनरल बोगी में अगर झांक कर देखा जाए तो आप समझ जाएंगे कि उस समय जानवरो से भरी गाडी भी शायद ट्रेन की उस बोगी से अच्छी होगी,क्यों कि उनको कम से कम उनके हिसाब से खडे होने की जगह तो दी जाती है।पर ट्रेन की जनरल बोगी मे तो लेागो को खडे होने की जगह भी मिल जाए तो गनीमत है।खासकर जब ट्रेन लबी दूरी तय करने वाली हो तो उसके जनरल कोच में बैठने वालों का तो भगवान ही मालिक है,।ट्रेन के गेट पर चार से पांच लडके आपको लटकते हुए मिल जाएंगे।आप जैसे तैसे अंदर चले भी गए तो पहले से ही जिस सीट पर चार लोगों को बैठना चाहिए वहां 6 से अधिक लोग बैठे हुए दिख जाएंगे।
सीट के उपर जैसे 3उल्लू बिठा दिए है, वो भी इस जद्वोजहद में लगे रहते है कि अब कोई और जगह पर बैठने के लिए ना लडे़। साइड वाली सिंगल सीट पर भी एक के बाद दूसरा भाई ऐसे बेठा है कि उसकी तशरीफ का एक हिस्सा ही सीट पर है दूसरा हिस्सा आराम से हवा में लटक रहा है। 100 लेागों की बोगी में ट्रेन के चलते समय से ही 300 से अधिक लोग चढ चुके है। ट्रेन के शुरू होने तक तो लोग खडे़ होकर जैसे तेसे अपने आप को सम्हाल लेते है पर एक घंटे बाद खडे हुए लोग फर्श पर ही धीरे धीरे जगह बनाकर लेट जाते है। हालात ये होते है कि ट्रेन में अगर किसी को एक नंबर जाना हो तो लोगो के ऊपर होते हुए जगह बनाकर बडी़ मुष्किल से निकल सकता है। वो भी अगर किसी के ऊपर पैर रख दिया तो समझो कि टांयलेट वाला काम कहीं वहीं ना करना पडे़।
कुछ लोग इस के अभ्यस्त हो चुके होते है तो वो सर्कस की तर्ज पर सफर करते है। सामान रखने वाली लोहे की एंगल से चादर का सिरा बांध कर वो झूला तैयार करते है और उसी में लेट कर सफर करना शुरू कर देते है। अगर किस्मत से एक सिरा खुल जाए तो उसके बाद क्या होगा ये उनकी किस्मत। ट्रेन के चलने के बाद जो स्टेसन आते है उन पर उतरने वाले तो नहीं पर चढ़ने वाले तैयार होते है, इस चक्कर में गेट पर बैठे लोगो से उनको जेसे युद्व करना पड़ता है कई युद्व में हार जाते है और जो वीर होते है वो अंदर आकर फिर बैठने के लिए नये युद्व का उद्वघेाश करते है। संख्या अधिक होती है तो जैसे तैसे मां बहन कर वो अपने लिए सीट बना ही लेते है।
ये एक ट्रेन की कहानी नहीं है, हर रोज चलने वाली सैकडो ट्रेनों के लाखो यात्रीयों की कहानी है।जो हर रोज इस यातना भरे सफर को करने के लिए मजबूर है। इन लोगो को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में बुलट ट्रेन चलेगी या नही, वाई फाई स्टेसन होगा या नहीं। इनको बस एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए ट्रेन में सिर्फ इज्जत के साथ जगह मिल जाए तो इनके लिए सबसे बड़ी बात होगी।और शायद मानवता के लिए भी।
सालो से देश की धमनी कही जाने वाली रेल की तस्वीर पिछले 50 सालों में नहीं बदली। पिछली कई सरकारे किराया कम करने के नाम पर जरूर गरीब को राहत देने का दिखावा करती आई हैं, पर मोदी सरकार ने तो इस दिखावे से भी परहेज किया। मोदी सरकार ने रेलवे को घाटे में बताकर उसके किराये में जबरदस्त व्रद्वि की।कुछ व्रद्वि सीधे तोर पर तो कुछ इस तरह से बढाया गया कि लोगो को सीधे सीधे समझ में ही नहीं आया।पर फिर भी जनता ने इस बदलवा की बयार को स्वीकार करते हुए मोदी सरकार का साथ दिया।रेलवे स्टेषनों को वाई फाई किया गया,स्टेषनों पर स्कलेटर बनाए गए, बुलट ट्रेन चलाने का परीक्षण किया गयाऔर जल्द ही देष के कई हिस्सों में मेट्रेा ट्रेन का भी काम शुरू हो चुका है।
विकास की इन सब तस्वीरों के बाद भी नहीं बदली तो रमा बाई की तकदीर,नहीं बदली किषन की तस्वीर, वो और उसका परिवार आज भी देश के एक छोर से दूसरे छोर पर जब मजदूरी करने जाता है या वहां से वापस अपने घर आता है तो उसे इसी आधुनिक रेल की सामान्य बोगी में एक सम्मान जनक स्थिती में बैठने तक को नहीं मिलता। रेल प्रशासन वाई फाई करने की बात तो कह रहा है, बुलट ट्रेन चलाने की बात तो कह रहा है पर लंबी दूरी की ट्रेनों में सामान्य बोगी बढाने की बात क्यों नहीं कह रहा।
आज भी 80 लेागो के बैठने वाली सामान्य बोगी में 300 से 400 लोग भेड़ बकरीयों की तरह भर कर सफर करते है। हालात ये होते है कि सीट के नीचे बैठ कर, लेट कर लोग घंटो के सफर को तय करते है। हालात ये होते है कि ट्रेन में जगह ना होने के चलते यात्री गेट पर खडे होकर आए दिन हादसों के शिकार होते है और अपनी जान गवांते है, पर शायद इन सब से सरकार या तो वाकिफ नहीं है या फिर जानबूझ कर वाकिफ होना नहीं चाहती। क्या इन लोगो को सम्मान के साथ सफर करने का हक नहीं है।रेल मंत्रालय आधुनिकता की बात कर रहा है पर क्या वो ट्रेनों में जनरल बोगीयों की संख्या बढाकर इन गरीबो को उनका अधिकार नहीं दिला सकता।देश को वाई फाई से अधिक,बुलेट टेन से अधिक आज ये जरूरत है कि रेल के हर यात्री को सम्मान के साथ कम से कम सफर करने का अधिकार मिले।

विजय तिवारी मुरैना
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