कैसे संभव होगी पीएम मोदी की कैशलेश सोच…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के फैसले के बाद देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही है। पीएम की इस बात के साथ ही देश में एक नई बहस छिड़ गई है।  क्या भारत अभी कैशलेस अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है या नहीं। कैशलेस अर्थव्यवस्था की योजना एक बेहतर योजना है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था संभव है और अगर संभव है तो पूरी तरह से कैशलेस बनाने का सपना कितने हद तक साकार होगा।

एक सवाल यह भी है कि क्या यह हमारे देश के सामाजिक एवं आर्थिक ढांचे के अनुरूप फिट बैठेगा? देश को कैशलेस बनने में अभी बहुत वक्त लगेगा संभवत 10 से 15 साल या उससे भी अधिक। भारत एक विशाल देश है यहां समानताएं-असमानताएं बहुत ज्यादा हैं। शहरी भारत आज 4जी स्पीड और कहीं उससे अधिक की बात करता है पर असली भारत तो गांवों में बसता है और कैशलेस अर्थव्यवस्था का फैसला इन ग्रामीण भारतीयों को अनदेखा कर नहीं लिया जा सकता है। गांवों में आज भी शिक्षा के साथ-साथ निरक्षरता चरम पर है।

देश की 125 करोड़ की आबादी में से अधिकतर लोग गरीब और अशिक्षित हैं, जिनके लिए कैशलेस लेनदेन की बात आसमान से तारे तोड़ने जैसी है। उन्हें कैशलेस की आदत डालने से पहले शिक्षित करना पड़ेगा जरूरी है। शिक्षित करने के बाद समस्या यह भी है कि देश के कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, वहां कैशलेस सोचना अपने आप में बेमानी होगा।

देश के जिस एक तबके को स्मार्टफोन चलाना तक नहीं आता उनके लिए ई-बैंकिंग कैसे संभव है। देश के 70 करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाता है इनमें से 24 करोड़ खाते पिछले एक साल में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खुले हैं। हमारे देश में 75 फीसदी आर्थिक लेनदेन नकदी में होता है। फिलहाल, देश की साक्षरता दर 74.04 फीसदी है। ऑनलाइन लेनदेन के लिए शिक्षित होना अनिवार्य है।
पवन तिवारी

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