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अब मिलेगी गाजर घास से मुक्ति

भारत में खेती को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचाने वाले गाजर घास को मुक्ति दिलाने के लिये आखिरकार हमारे कृषि वैज्ञानिको ने तैयारी कर ली है। रायपुर कृषि विश्व विद्यालय ने कीट की ऐसी प्रजाति तैयारी की है जो गाजर घास को खाकर नष्ट कर देगी।

पार्थीनियम का जैविक नियंत्रण मैक्सीकन बीटल जिसे जागोग्रामा बाईकोलोरेट कीट कहा जाता है यह एख गाजर घास क के पूर्ण पौधे को एक हफ्ते में खा जाता है। इसके अंडे से बच्चे तैयार होने में 4 दिन लगते हैं। औऱ बच्चे वयस्क दोनों ही पार्थीनियम को खाकर नष्ट कर देते हैं। अब कृषि वैज्ञानिक का वितरण किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें खेत के आसपास क्षेत्रों में स्थापित करने को कहा गया। और इसके परिणाम बहुत बेहतर मिल रहे हैं। उम्मीद की जा रहा है कि जैसे- जैसे इनकी संख्या बढ़ेगी, उसके आधार पर गाजर घास की पैदावार कम हो जाएगी।

गाजर घास की समस्या से अब्र देश भर के किसानों को आने वाले कुछ वर्षों में जल्द राहत मिल सकेगी। इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय रायपुर के कीट विभाग की जैविक कीट नियंत्रण प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने गाजर घास को खत्म करने के लिए कीट तैयार किया है । जो जैविक पद्धति से गाजर घास को खत्म कर देगा। चटख चांदनी, जिसे गाजर घास भी कहा जाता है, देशभर में तेजी से बढ़ रहीं इसकी पैदावार को रोकने के लिए रिसर्च किया था। देश में इसकी आवक अमेरिका से 1954 में गैंहु के साथ हुई थी जो अब पूरे देश भर में फैल गया। हर प्रकार के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता वाली गाजर घास एक खरपतवार है, जो 90 सेमी से 100 मीटर ऊंची होती है । इसकी पत्तियां गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों की तरह होती हैं। अक्सर सड़क के किनारे, खेत के मेड़ पर पाई जाती है। फूल सफेद रंग के छोटे-छोटे तथा शाखाओं के शीर्ष पर लगते हैं।

गाजर घास का मानव स्वास्थ्य पर कुप्रभाव
* गाजर घास की वजह से मनुष्य में तरह-तरह के चर्म रोग हो जाते हैं।
* संपर्क लगातार बने रहने पर शरीर की चमड़ी के ऊपर एक्जिमा की तरह प्रभाव पड़ता है।
* चर्म रोग के अतिरिक्त पार्थीनियम के कारण सांस संबंधी रोग जैसे दमा ( अस्थमा) आदि भी होते हैं।

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